Solutions For Class 6 Hindi


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Solutions For Class 6 Hindi 2025-26

Teacher Amrendra Singh Call @ 8967311377

अध्याय 14. नृत्यांगना सुधाचंद्रन

अति लघूत्तरीय प्रश्न- प्रश्न-बताइए, किसने कहा?

प्रश्न 1- सुधाचंद्रन ने कितनी आयु में नृत्य विद्यालय में प्रवेश लिया?

उत्तर : पाँच वर्ष की आयु में।

प्रश्न 2- सुधा चंद्रन के नृत्य विद्यालय का क्या नाम है?

उत्तर : कला-सदन।

प्रश्न 3- सुधा चंद्रन का उपचार करने वाले चिकित्सक कौन थे?

उत्तर : डॉ. पी० सी० सेठी।

लघूत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1 - सुधा चंद्रन के माता-पिता की क्या इच्छा थी?

उत्तर : सुधा चंद्रन के माता-पिता की हार्दिक इच्छा थी कि उनकी पुत्री एक राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नृत्यांगना बने।

प्रश्न 2- सुधा चंद्रन के साथ 2 मई, 1981 को कैसी दुर्घटना हुई थी?

उत्तर : 2 मई, 1981 को तिरुचिरापल्ली से मद्रास जाते समय उनकी बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इस दुर्घटना में उनका बायाँ पैर घायल हुआ और दाएँ पैर में गंभीर चोट लगने से गैंग्रीन हो गया, जिसके कारण दायीं टाँग काटनी पड़ी।

दीर्घउत्तरीय प्रश्न -

प्रश्न - 1. 'प्रयास करो तो सब संभव है।' डॉ. सेठी के ऐसा कहने के पीछे क्या भाव था? सविस्तार स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : डॉ. सेठी ने सुधा चंद्रन के लिए विशेष प्रकार की कृत्रिम टाँग तैयार की थी, जो नृत्य के लिए उपयुक्त बनायी गई थी। उन्होंने अपना पूरा चिकित्सकीय प्रयास कर दिया था। जब उन्होंने कहा—“मैं जो कुछ कर सकता था, कर दिया; अब तुम्हारी बारी है”— तो उनका आशय यह था कि अब आगे की सफलता सुधा की मेहनत, हिम्मत और लगन पर निर्भर है। वे सुधा को यह विश्वास दिलाना चाहते थे कि यदि वह निरंतर अभ्यास करती रहे, हार न माने, और साहस बनाए रखे, तो वह फिर से नृत्य कर सकती है। इस वाक्य में यह संदेश छिपा है कि— जीवन में कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है; प्रयास, दृढ़ निश्चय और आत्मविश्वास से सब कुछ संभव हो जाता है।

प्रश्न - 2. सुधाचंद्रन ने किन प्रयासों से अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ उपलब्धियाँ हासिल कीं?

उत्तर : सुधा चंद्रन ने अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ उपलब्धियाँ निम्न प्रयासों से हासिल कीं— • दुर्घटना के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और सहारे के सहारे चलना सीख लिया। • उन्होंने डॉ. पी. सी. सेठी से कृत्रिम टाँग लगवाकर नृत्य का पुनः अभ्यास आरंभ किया। • अभ्यास के दौरान पैर से खून निकलने तक उन्होंने कड़ा और निरंतर अभ्यास जारी रखा। • उन्होंने नई टाँग के साथ नृत्य मुद्राओं पर नियंत्रण पाने के लिए अथक परिश्रम किया। • 28 जनवरी 1984 को उन्होंने फिर से सार्वजनिक मंच पर नृत्य प्रस्तुति दी, जो अत्यंत सफल रही। • बाद में उन्होंने फ़िल्म ‘मयूरी’ में अपने जीवन को स्वयं निभाकर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया। इन सभी प्रयासों के कारण वे एक असाधारण नृत्यांगना ही नहीं, बल्कि प्रेरणादायक व्यक्तित्व भी बन गईं।

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Download अध्याय 14. नृत्यांगना सुधाचंद्रन (जीवनी)

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