
उत्तर : हरिशंकर परसाई द्वारा प्रस्तुत प्रेमचंद के शब्दचित्र से उनके व्यक्तित्व की निम्नलिखित विशेषताएं उभरकर आती हैं: सादगी औ र सरलता: प्रेमचंद बहुत ही सीधा-सादा जीवन जीते थे और दिखावे से कोसों दूर थे. ईमानदारी: वे अपने वास्तविक रूप में ही रहना पसंद करते थे, उनके चेहरे पर कोई झूठ या बनावट नहीं थी. स्वाभिमान: वे एक स्वाभिमानी व्यक्ति थे और किसी से कुछ मांगना या समझौता करना उनके स्वभाव के विरुद्ध था. संघर्षशीलता: वे जीवन में आने वाली हर परिस्थिति और कठिनाई का डटकर मुकाबला करते थे, मुसीबतों से घबराते नहीं थे. उच्च विचार: उनके विचार बहुत उच्च थे और वे सामाजिक बुराइयों तथा पाखंड से दूर रहते थे. संतोषी स्वभाव: उन्हें इस बात की चिंता नहीं रहती थी कि लोग उनके फटे जूते या वेशभूषा के बारे में क्या कहेंगे.
उत्तर : (क) बाएँ पाँव का जूता ठीक है मगर दाहिने जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है।(✔) (ख) लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिंचाते हैं जिससे फोटो में खुशबू आ जाए।(✔) (ग) तुम्हारी यह व्यंग्य मुसकान मेरे हौसले बढ़ाती है।(x) (घ) जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ अँगूठे से इशारा करते हो?(✔)
उत्तर : प्रतीक: जूता धन, शक्ति और भौतिक सुख-सुविधा का प्रतीक है; टोपी मान-मर्यादा, सम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक है. व्यंग्य: यह समाज की बदलती मानसिकता पर कटाक्ष है, जहाँ धनवान और शक्तिशाली लोग (जूते) साधारण या सम्मानित व्यक्तियों (टोपी) पर हावी हो जाते हैं. पहले भी जूता महंगा था, लेकिन अब स्थिति यह है कि एक धनवान व्यक्ति के लिए कई स्वाभिमानी लोग अपना सम्मान (टोपी) कुर्बान कर देते हैं. यह दिखाता है कि आज सत्ता और पैसे के आगे गुणवानों और स्वाभिमानी लोगों का कोई मोल नहीं रह गया है.
उत्तर : प्रतीक: यहाँ 'पर्दा' इज्जत, मर्यादा, दिखावा या सामाजिक दिखावे का प्रतीक है. व्यंग्य: यह पंक्ति दो तरह के लोगों के बारे में है. एक वे जो इज्जत (पर्दा) को सब कुछ मानते हैं और उस पर सब कुछ न्योछावर कर देते हैं. दूसरे वे (शायद प्रेमचंद) जो इन दिखावों को महत्व नहीं देते. यह दिखाता है कि समाज में कुछ लोग इज्जत के लिए जीते हैं, जबकि कुछ लोग इज्जत के दिखावे के लिए जी रहे हैं और इस आडंबर पर अपनी आत्मा तक बेच रहे हैं. यह व्यक्ति और समाज के बदलते मूल्यों पर व्यंग्य है, जहाँ सच्चाई से ज़्यादा दिखावे को महत्व दिया जाता है.
उत्तर : प्रतीक: 'हाथ की उँगली' से इशारा करना सामान्य और सभ्य तरीका है, जबकि 'पाँव की उँगली' (ठेंगा दिखाना) घृणा, तिरस्कार और नीचा दिखाने का प्रतीक है, जो अशोभनीय है. व्यंग्य: इस पंक्ति में लेखक (हरिशंकर परसाई) प्रेमचंद के फटे जूते की तुलना में समाज के पाखंडी लोगों पर व्यंग्य करते हैं. वे कहते हैं कि जो लोग घृणा या तिरस्कार करते हैं, वे हाथ की उँगली से नहीं, बल्कि पाँव की उँगली से इशारा करते हैं, जो उनकी हीनता और सभ्य समाज से दूरी को दर्शाता है. यह प्रेमचंद की सादगी और ईमानदारी के विपरीत समाज के आडंबरपूर्ण और निम्न विचारों पर कटाक्ष है, जहाँ घृणा को भी इस तरह प्रदर्शित किया जाता है.
उत्तर : लेखक का विचार बदलने का मुख्य कारण यह था कि उन्हें एहसास हुआ कि प्रेमचंद जैसे महान लेखक की पहचान उनकी सादगीपूर्ण, आडंबर-रहित जीवनशैली और लेखन से है, न कि दिखावे या महंगी पोशाकों से, और वे जैसे थे (साधारण) वैसे ही दिखना चाहते थे, इसलिए उनकी अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी, बल्कि वही फटा जूता उनकी असली पहचान है जो उनके वास्तविक व्यक्तित्व को दर्शाता है। विचार बदलने के कारण: सादगीपूर्ण जीवनशैली: लेखक ने समझा कि प्रेमचंद दिखावे से दूर, बेहद साधारण जीवन जीते थे और उनके पास अलग-अलग पोशाकें रखने का कोई मतलब नहीं था। आंतरिक सच्चाई: उन्हें महसूस हुआ कि प्रेमचंद भीतर से जैसे थे, वैसे ही बाहर भी दिखते थे; उनका व्यक्तित्व दोहरी जीवनशैली वाला नहीं था। साहित्यिक पहचान: लेखक को यह बोध हुआ कि प्रेमचंद की असली पहचान उनके विचारों, साहित्य और फटे जूतों में छिपी सच्चाई में है, न कि बाहरी दिखावे में। आर्थिक स्थिति: उनकी सीमित आय और साधारण जीवन के कारण यह भी एक कारण था कि उनके पास कई पोशाकें नहीं हो सकती थीं। निष्ठा और यथार्थवाद: प्रेमचंद ने फोटो खिंचवाने के लिए कोई विशेष तैयारी नहीं की, बल्कि अपनी असलियत (फटा जूता) को ही दिखाया, जो उनकी सच्चाई और यथार्थवादी सोच को दर्शाता है, इसलिए लेखक समझ गए कि उनकी अलग पोशाकें नहीं होंगी, बल्कि वे हमेशा ऐसे ही साधारण रहेंगे।
उत्तर : इस व्यंग्य को पढ़कर लेखक की सूक्ष्म दृष्टि, गहरी सामाजिक समझ, सरल लेकिन प्रभावशाली भाषा, विस्तारण शैली (बात से बात निकालना), और कड़वी सच्चाई को सहजता से कहने की कला आकर्षित करती है, जो दिखावे के समाज पर तीखा प्रहार करती है और पाठक को सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे एक साधारण सी चीज़ (फटे जूते) से पूरे व्यक्तित्व और सामाजिक विसंगतियों का पर्दाफाश किया जा सकता है, जिससे पाठक लेखक की तटस्थता और गहरी अनुभूति से जुड़ता है। लेखक को आकर्षित करने वाली मुख्य बातें: सूक्ष्म निरीक्षण और विस्तारण शैली: लेखक प्रेमचंद के फटे जूतों से बात शुरू करते हैं और कैसे वे एक-एक करके प्रेमचंद के व्यक्तित्व, उनकी सादगी, और फिर समाज की विडंबनाओं (जैसे दिखावा, रूढ़ियाँ) तक पहुँचते हैं, यह शैली बेहद आकर्षक है (बूंद में समुद्र देखना)। गहरी सामाजिक समझ: लेखक सामाजिक बुराइयों (दिखावा, आडंबर, रूढ़िवादिता) के प्रति सजग हैं और उन्हें प्रेमचंद के माध्यम से दिखाते हैं। वे केवल जूते नहीं, बल्कि पूरे समाज की वास्तविकता को उजागर करते हैं। सरल और प्रभावशाली भाषा: लेखक की भाषा सरल, स्पष्ट और सीधी है, जिससे पाठक तुरंत जुड़ाव महसूस करता है। वे कटु सत्य को भी बड़ी सहजता से कह देते हैं, जिससे वह अप्रत्यक्ष रूप से चोट करता है। तटस्थ और आत्म-विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण: लेखक खुद को भी व्यंग्य से अलग नहीं रखते। वे प्रेमचंद के जूते देखकर अपनी पोशाक पर भी सोचने लगते हैं, जो उनकी ईमानदारी और तटस्थता को दर्शाता है। हास्य और व्यंग्य का संगम: लेखक हास्य के माध्यम से गंभीर बातों को कहते हैं, जिससे पाठ रोचक बनता है और पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करता है कि समाज में क्या सुधार की ज़रूरत है। संक्षेप में, लेखक की विश्लेषणात्मक क्षमता, सामाजिक संवेदनशीलता और अपनी बात कहने का अनूठा तरीका पाठक को बेहद प्रभावित करता है।
उत्तर : पाठ में 'टीले' शब्द का प्रयोग सामाजिक बुराइयों, कुरीतियों, भेदभाव, अन्याय, शोषण और मानसिक बाधाओं के लिए किया गया है, जो व्यक्ति और समाज के विकास के मार्ग में बड़ी अड़चनें (रुकावटें) पैदा करती हैं, जैसे कि प्रेमचंद के फटे जूते पाठ में दिखाया गया है। ये 'टीले' असल में जाति-पाति, ऊँच-नीच, गरीबी, अंधविश्वास और महाजन सभ्यता जैसी समस्याएँ हैं, जिन्हें लेखक ठोकर मारकर हटाना चाहते हैं। टीले शब्द के उपयोग के मुख्य संदर्भ: सामाजिक बाधाएँ: यह शब्द समाज में फैली उन समस्याओं को दर्शाता है जो प्रगति रोकती हैं, जैसे छुआछूत और भेदभाव। मानसिक रुकावटें: यह व्यक्ति के विचारों और सोच में आने वाली मानसिक अड़चनों का भी प्रतीक है। कठिनाइयाँ: प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों को अपने जीवन और लेखन में जिन कठिनाइयों (जैसे अभाव, शोषण) का सामना करना पड़ा, वे भी 'टीले' हैं। व्यंग्यात्मक प्रयोग: लेखक ने व्यंग्य के रूप में इन छोटी दिखने वाली, पर गहरी असर करने वाली बुराइयों को 'टीले' कहा है, जिन्हें ठोकर मारकर पार करना मुश्किल है। संक्षेप में, 'टीले' यहाँ जीवन के सहज प्रवाह को बाधित करने वाली हर उस चीज़ का प्रतीक हैं, चाहे वह सामाजिक हो या व्यक्तिगत।