Solutions For Class 9 Hindi


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Solutions For Class 9 Hindi 2025-26

Teacher Amrendra Singh Call @ 8967311377

अध्याय 4. जाबिर हुसैन : साँवले सपनों की याद

प्रश्न - 1. किस घटना ने सालिम अली के जीवन की दिशा को बदल दिया और उन्हें पक्षी प्रेमी बना दिया?

उत्तर : एक बार बचपन में सालिम अली की एयरगन से एक गौरैया घायल होकर गिर पड़ी। इस घटना ने सालिम अली के जीवन की दिशा को बदल दिया। वे गौरैया की देखभाल, सुरक्षा और खोजबीन में जुट गए। उसके बाद उनकी रुचि पूरे पक्षी-संसार की ओर मुड़ गई। वे पक्षी-प्रेमी बन गए।

प्रश्न - 2. सालिम अली ने पूर्व प्रधानमंत्री के सामने पर्यावरण से संबंधित किन संभावित खतरों का चित्र खींचा होगा कि जिससे उनकी आँखें नम हो गई थीं?

उत्तर : सालिम अली ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह के सामने केरल की साइलेंट वैली संबंधी खतरों की बात उठाई होगी।

प्रश्न - 3. लॉरेंस की पत्नी फ्रीडा ने ऐसा क्यों कहा होगा कि "मेरी छत पर बैठने वाली गोरैया लॉरेंस के बारे में ढेर सारी बातें जानती है?"

उत्तर : लॉरेंस की पत्नी फ्रीडा जानती थी कि लॉरेंस को गौरैया से बहुत प्रेम था। वे अपना काफी समय गौरैया के साथ बिताते थे। गोरैया भी उनके साथ अंतरंग साथी जैसा व्यवहार करती थी। उनके इसी पक्षी-प्रेम को उद्घाटित करने के लिए उन्होंने यह वाक्य कहा।

प्रश्न - प्रश्न 4. आशय स्पष्ट कीजिए-

प्रश्न - (क) वो लॉरेंस की तरह, नैसर्गिक जिंदगी का प्रतिरूप बन गए थे।

उत्तर : अंग्रेजी के कवि डी.एच. लॉरेंस प्रकृति के प्रेमी थे। उनका जीवन प्रकृतिमय हो चुका था। उन्हीं की भाँति सालिम अली भी स्वयं को प्रकृति के लिए समर्पित कर चुके थे। यहाँ तक कि वे स्वयं प्रकृति के समान सहज-सरल, भोले और निश्छल हो चुके थे।
यहाँ नैसर्गिक जिंदगी के प्रतिरूप के दो अर्थ हैं-
1. प्रकृति में खो जाना; प्रकृतिमय हो जाना।
2. प्रकृति के समान सहज-सरल हो जाना।

प्रश्न - (ख) कोई अपने जिस्म की हरारत और दिल की धड़कन देकर भी उसे लौटाना चाहे तो वह पक्षी अपने सपनों के गीत दोबारा कैसे गा सकेगा!

उत्तर : लेखक कहना चाहता है कि सालिम अली की मृत्यु के बाद वैसा पक्षी-प्रेमी और कोई नहीं हो सकता। सालिम अली रूपी पक्षी मौत की गोद में सो चुका है। अतः अब अगर कोई अपने दिल की धड़कन उसके दिल में भर भी दे और अपने शरीर की हलचल उसके शरीर में डाल भी दे, तो भी वह पक्षी फिर से वैसा नहीं हो सकता क्योंकि उसके सपने अपने ही शरीर और अपनी ही धड़कन से उपजे थे। वे मौलिक थे। किसी और की धड़कन और हलचल सालिम अली के सपनों को पुनः जीवित नहीं कर सकती। आशय यह है कि उनके जैसा पक्षी प्रेमी प्रयासपूर्वक उत्पन्न नहीं किया जा सकता।

प्रश्न - (ग) सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाए अथाह सागर बनकर उभरे थे।

उत्तर : सालिम अली प्रकृति के खुले संसार में खोज़ करने के लिए निकले। उन्होंने स्वयं को किसी सीमा में कैद नहीं किया। वे एक टापू की तरह किसी स्थान विशेष या पशु-पक्षी विशेष से नहीं बंध गए। उन्होंने अथाह सागर की तरह प्रकृति में जो-जो अनुभव आए, उन्हें सँजोया। उनका कार्यक्षेत्र बहुत विशाल था।

प्रश्न - 5. इस पाठ के आधार पर लेखक की भाषा-शैली की चार विशेषताएँ बताइए।

उत्तर : 'साँवले सपनों की याद नामक पाठ की भाषा-शैली संबंधी विशेषताएँ निम्नलिखित है-
1. मिश्रित शब्दावली का प्रयोग इस पाठ में उर्दू, तद्भव और संस्कृत शब्दों का मिश्रण है। लेखक ने उर्दू शब्दों का अधिक प्रयोग किया है। उदाहरणतया जिंदगी, परिंदा, खूबसूरत, हुजूम, खामोश, सैलानी, साकर, तमाम, आरिझी, माहोल, खुर। संस्कृत शब्दों का प्रयोग भी प्रचुरता से हुआ है। जैसे- संभव, अंतहीन, पक्षी, वर्ष, इतिहास, वाटिका, विश्राम, संगीतमय, प्रतिरूप। जाबिर हुसैन की शब्दावली गंगा-जमुनी है। उन्होंने संस्कृत-उर्दू का इस तरह प्रयोग किया है कि ये सगी बहने लगती हैं। जैसे अंतहीन सफर, प्रकृति को नञ्जर, दुनिया संगीतमय, जिंदगी का प्रतिरूप। इन प्रयोगों में एक शब्द संस्कृत का, तो दूसरा उर्दू का है।
2. जटिल वाक्यों का प्रयोग-ताबिर हुसैन की वाक्य रचना बंकिम और जटिल है। वे सरल-सीधे वाक्यों का प्रयोग नहीं करते। कलात्मकता उनके हर वाक्य में है। उदाहरणतया-
'सुनहरे परिंदों के खूबसूरत पंखों पर सवार साँवले सपनों का एक हुजूम मौत की खामोश वादी की तरफ अग्रसर है।' पता नहीं, इतिहास में कब कृष्ण ने वृंदावन में रासलीला रची थी और शोख गोपियों को अपनी शरारतों का निशाला बनाया था।
3. अलंकारों का प्रयोग जाबिर हुसैन अलकारों की भाषा में लिखते हैं। उपमा, रूपक, उनके प्रिय अलंकार हैं। उदाहरणतया -
अब तो वो उस वन-पक्षी की तरह प्रकृति में विलीन हो रहे हैं। (उपमा) सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाय अथाह सागर बनकर उभरे थे। रोमांच का सोता फूटता महसूस कर सकता है? (रूपक)
4. भावानुरूप भाषा-जाबिर हुसैन भाव के अनुरूप शब्दों और वाक्यों की प्रकृति बदल देते हैं। उदाहरणतया, कभी वे छोटे-छोटे वाक्य प्रयोग करते हैं-
आज सालिम अली नहीं हैं। चौधरी साहब भी नहीं हैं। कभी वे उत्तेजना लाने के लिए प्रश्न शैली का प्रयोग करते हैं और जटिल वाक्य बनाते चले जाते हैं। जैसे कौन बचा है, जो अब सोंधी माटी पर उगी फसलों के बीच एक नए भारत की नींव रखने का संकल्प लेगा? कौन बचा है, जो अब हिमालय और लद्दाख की बर्फीली जमीनों पर जीने वाले पक्षियों की वकालत करेगा?

प्रश्न - 6. इस पाठ में लेखक ने सालिम अली के व्यक्तित्व का जो चित्र खींचा है उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर : सालिम अली अनन्य प्रकृति प्रेमी थे। उन्हें पक्षियों से विशेष प्रेम था। लेखक के शब्दों में, 'उन जैसा 'बर्ड वाचर' शायद कोई हुआ है।' वे हमेशा आँखों या गले में दूरबीन लटकाए रहते थे। उन्हें दूर आकाश में उड़ते पक्षियों की खोज करने का तथा उनकी सुरक्षा के उपाय खोजने का असीम चाव था। वे स्वभाव से परम घुमक्कड़ और यायावर थे। लंबी यात्राओं ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया था। व्यवहार में वे इतने सरल सीधे और भोले इनसान थे कि जटिल आदमी हैरानी में पड़ जाते थे कि क्या यही आदमी प्रसिद्ध पक्षी प्रेमी सालिम अली है। वे किसी भी बाहरी चकाचौंध और विशिष्टता से दूर थे।

प्रश्न - 7. 'साँवले सपनों की याव' शीर्षक की सार्थकता पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर : 'साँवले सपनों की याद' एक रहस्यात्मक शीर्षक है। इसे पढ़कर पाठक जिज्ञासा से आतुर हो जाता है कि कैसे सपने? किसके सपने? कौन-से सपने? ये सपने साँवले क्यों हैं? कौन इन सपनों की याद में आतुर है? आदि। 'साँवले सपने' मनमोहक इच्छाओं के प्रतीक हैं। ये सपने प्रसिद्ध पक्षी प्रेमी सालिम अली से संबंधित हैं। सालिम अली जीवन-भर सुनहरे पक्षियों की दुनिया में खोए रहे। वे उनकी सुरक्षा और खोज के सपनों में खोए रहे। ये सपने हर किसी को नहीं आते। हर कोई पक्षी-प्रेम में इतना नहीं डूब सकता। इसलिए आज जब सालिम अली नहीं रहे तो लेखक को उन साँवले सपनों की याद आती है जो सालिम अली की आँखों में बसते थे। यह शीर्षक सार्थक तो है किंतु गहरा रहस्यात्मक है। चंदन की तरह घिस घिसकर इसके अर्थ तथा प्रभाव तक पहुँचा जा सकता है।

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