प्रश्न - 1. लक्ष्मीबाई ने स्वयं को अकेला क्यों कहा?
उत्तर : :- लक्ष्मीबाई ने स्वयं को अकेला इसलिए कहा क्योंकि उनके पास शक्ति और साधन होते हुए भी उनके सहयोगी विलासिता और अव्यवस्था में डूबे हुए थे। उन्हें लगा कि स्वराज्य के संघर्ष में वे अकेली पड़ गई हैं।
प्रश्न - 2. जूही किस आधार पर लक्ष्मीबाई को निराशा के अनौचित्य की बात कहती है?
उत्तर : जूही इस आधार पर कहती है कि लक्ष्मीबाई गीता पढ़ती हैं और कर्म व बलिदान में विश्वास रखती हैं, इसलिए उनके लिए निराश होना उचित नहीं है।
प्रश्न - 3. जूही किसे अपना स्वामी मानती है?
उत्तर : जूही अपने देश को अपना स्वामी मानती है। साथ ही वह सरदार तात्या को भी अपना स्वामी मानती है, पर देश को सर्वोपरि रखती है।
प्रश्न - 4. “सारा आकाश धूम घटाओं से छाया हुआ है” का क्या अर्थ है?
उत्तर : इसका अर्थ है कि चारों ओर संकट, युद्ध और विनाश का वातावरण छाया हुआ है।
लघूत्तरीय प्रश्न-
प्रश्न - 1. मुंदर ने विलासिता में किसे डूबा हुआ बताया?
उत्तर : मुंदर ने राव साहब को विलासिता में डूबा हुआ बताया।
प्रश्न - 2. लक्ष्मीबाई ने कौन-सी प्रतिज्ञा की?
उत्तर : लक्ष्मीबाई ने यह प्रतिज्ञा की थी कि वे अपनी झाँसी किसी को नहीं देंगी।
प्रश्न - 3. पेशवा की सेना को किसने तथा कहाँ हराया?
उत्तर : पेशवा की सेना को जनरल रोज़ की सेना ने मुरार में हराया।
प्रश्न - 4. लक्ष्मीबाई तात्या से अपनी कौन-सी चिंता प्रकट करती है?
उत्तर : लक्ष्मीबाई तात्या से यह चिंता प्रकट करती हैं कि यदि विजय न मिले तो सेना और युद्ध-सामग्री को सुरक्षित निकाल लिया जाए और उनकी वीरता पर कोई कलंक न लगे।
दीर्घउत्तरीय प्रश्न -
प्रश्न - 1. पाठ का शीर्षक ‘स्वराज्य की नींव’ क्यों रखा गया है?
उत्तर : पाठ का शीर्षक ‘स्वराज्य की नींव’ इसलिए रखा गया है क्योंकि इसमें स्वराज्य प्राप्ति से अधिक उसके लिए बलिदान, त्याग, सेवा और संघर्ष को महत्त्व दिया गया है। लक्ष्मीबाई और उनके साथी जानते हैं कि भले ही उन्हें सफलता न मिले, लेकिन उनका संघर्ष आने वाले स्वराज्य की नींव बनेगा।
प्रश्न - 2. वीरता किसे पाकर धन्य है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : वीरता महारानी लक्ष्मीबाई को पाकर धन्य है। उनके भीतर अदम्य साहस, आत्मबल, देशप्रेम और बलिदान की भावना है। तात्या के अनुसार, उनके रहते वीरता पर कभी कलंक नहीं लग सकता।
प्रश्न - 3. पाठ के आधार पर लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर : महारानी लक्ष्मीबाई एक वीर, निडर, दृढ़ निश्चयी और देशभक्त शासिका हैं। वे स्वराज्य के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने को तैयार हैं। उनमें नेतृत्व क्षमता, आत्मसम्मान और कर्तव्यबोध स्पष्ट दिखाई देता है। वे विलासिता और अनुशासनहीनता की कटु आलोचना करती हैं तथा कर्म, त्याग और बलिदान को ही स्वराज्य का मार्ग मानती हैं।