उत्तर : गंगदत्त को उसके अपने ही कुटुम्बियों ने अपमानित किया था, इसी कारण वह विपत्ति में था।
प्रश्न 2- प्रियदर्शन कौन था?
उत्तर : प्रियदर्शन एक काला सर्प (कृष्ण सर्प) था।
प्रश्न - 3. प्रियदर्शन को देखकर गंगदत्त के मन में क्या विचार आया?
उत्तर : गंगदत्त ने सोचा कि इस सर्प को अपने कुएँ में ले जाकर अपने शत्रु मेंढकों का विनाश करा दे।
लघूत्तरीय प्रश्न-
प्रश्न - 1. गंगदत्त ने प्रियदर्शन से क्या विनती की?
उत्तर : गंगदत्त ने प्रियदर्शन से विनती की कि वह उसके साथ कुएँ में चले और वहाँ पहुँचकर केवल उन मेंढकों को खाए जिन्हें वह बताए, तथा उसके परिवार को न मारे।
प्रश्न - 2. प्रियदर्शन ने गंगदत्त की सहायता किस प्रकार की?
उत्तर : प्रियदर्शन ने गंगदत्त के बताने पर एक-एक करके उसके शत्रु मेंढकों को खाया और उनका पूर्ण विनाश कर दिया।
प्रश्न - 3. प्रियदर्शन गंगदत्त के परिजनों को भी खाने लगा था? क्यों?
उत्तर : हाँ। जब कुएँ में सब शत्रु मेंढक समाप्त हो गए और भोजन का अभाव हो गया, तब वह भूख के कारण गंगदत्त के परिजनों को भी खाने लगा।
प्रश्न - 4. गंगदत्त ने किस प्रकार अपनी जान बचाई?
उत्तर : गंगदत्त ने सर्प से बाहर जाकर भोजन लाने का बहाना बनाया। बाहर निकलकर वह वापस कुएँ में नहीं लौटा और इस प्रकार उसने अपनी जान बचाई।
दीर्घउत्तरीय प्रश्न -
प्रश्न - 1. ‘पैर में गड़े काँटे को किसी दूसरे काँटे से ही निकाला जा सकता है।’ — कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : इस कथन का अर्थ है कि कभी-कभी एक शत्रु को हराने या कठिनाई दूर करने के लिए दूसरे बलवान का सहारा लिया जाता है। कहानी में गंगदत्त अपने ही कुटुंबियों द्वारा अपमानित था। वह स्वयं उनसे बदला लेने में असमर्थ था। उसी समय उसे प्रियदर्शन नामक सर्प दिखाई दिया। उसने सोचा कि जैसे काँटे को काँटे से निकाला जाता है, वैसे ही वह अपने शत्रुओं को इस सर्प से मरवा सकता है। उसने सर्प को कुएँ में ले जाकर अपने विरोधियों का नाश करा दिया।
इस प्रकार कहानी दिखाती है कि कभी-कभी एक बड़ी समस्या को हल करने के लिए किसी और शक्तिशाली साधन का प्रयोग करना पड़ता है—यही इस कथन का अर्थ है।
प्रश्न - 2. प्रियदर्शन ने गंगदत्त को ‘कुलांगार’ माना तथा उसकी पत्नी ने उसे ‘कुलक्षयकारक’ कहा। ऐसा क्यों?
उत्तर : प्रियदर्शन ने गंगदत्त को ‘कुलांगार’ इसलिए माना क्योंकि गंगदत्त ने स्वयं ही अपने कुटुंबियों को उसके भोजन के लिए प्रस्तुत किया। यह अपने कुल का नाश करने जैसा कार्य था, इसलिए सर्प को वह कुलांगार लगा।
गंगदत्त की पत्नी ने उसे ‘कुलक्षयकारक’ इसलिए कहा क्योंकि गंगदत्त ने अपने स्वार्थ के लिए सर्प को कुएँ में बुलाया और धीरे-धीरे सर्प ने उसके पूरे कुल का विनाश कर दिया। गंगदत्त का यह निर्णय उसके वंश के विनाश का कारण बना।
इसलिए एक ओर सर्प, और दूसरी ओर उसकी पत्नी—दोनों ने उसे अपने-अपने दृष्टिकोण से अपने कुल का नाश करने वाला माना।